Heart Touching Ghazal in Hindi | रोमांटिक लव ग़ज़ल हिंदी

Heart Touching Ghazal : रोमांटिक लव ग़ज़ल हिंदी  अगर  आपको रोमांटिक लव ग़ज़ल पढना पसंद हैं और आप अपने दोस्तों के साथ शेयर करना पसंद करते  है शेयर कर सकते हैं आपको और शायरी पड़ना हैं तो आपको यहाँ vipchilli पर सबसे  लव ग़ज़ल  मिलेंगे। हम यहाँ आपके साथ सभी Category के Shayari शेयर करते हैं, ताकि आप अपने जीवन के हर एक पल ख़ुशी से जी  सके। कुछ लोग  Famous Shayari पढना  पसंद करते  है,  अगर आपको कुछ भी प्रशन हैं तो कमेंट में पूझ सकते हैं 

रोमांटिक लव ग़ज़ल हिंदी

शायर : दाग देहलवी

ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा
ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा

 

अपने दिल को भी बताऊँ न ठिकाना तेरा
सब ने जाना जो पता एक ने जाना तेरा

 

तू जो ऐ ज़ुल्फ़ परेशान रहा करती है
किस के उजड़े हुए दिल में है ठिकाना तेरा

 

आरज़ू ही न रही सुबहे-वतन की मुझको
शामे-गुरबत है अजब वक़्त सुहाना तेरा

 

(सुबहे-वतन – स्वदेश की सुबह, शामे-गुरबत – परदेश की शाम )

 

ये समझकर तुझे ऐ मौत लगा रक्खा है
काम आता है बुरे वक़्त में आना तेरा

 

ऐ दिले शेफ़्ता में आग लगाने वाले
रंग लाया है ये लाखे का जमाना तेरा

 

(दिले शेफ़्ता – पागल दिल)

 

तू ख़ुदा तो नहीं ऐ नासहे नादाँ मेरा
क्या ख़ता की जो कहा मैंने न माना तेरा

 

(नासहे – समझाने वाला )

 

रंज क्या वस्ले अदू का जो तअल्लुक़ ही नहीं
मुझको वल्लाह हँसाता है रुलाना तेरा

 

(वस्ले अदू – दुश्मन से मिलन)

 

क़ाबा-ओ-दैर में या चश्मो-दिले-आशिक़ में
इन्हीं दो-चार घरों में है ठिकाना तेरा

 

(क़ाबा-ओ-दैर – काबा यया मंदिर , चश्मो-दिले-आशिक़ – प्रेमी के दिल की आँख)

 

 

तर्के आदत से मुझे नींद नहीं आने की
कहीं नीचा न हो ऐ गौर सिरहाना तेरा

 

मैं जो कहता हूँ उठाए हैं बहुत रंजेफ़िराक़
वो ये कहते हैं बड़ा दिल है तवाना तेरा

 

(रंजेफ़िराक़ – बिछड़ने का दर्द, तवाना – मज़बूत)

 

बज़्मे दुश्मन से तुझे कौन उठा सकता है
इक क़यामत का उठाना है उठाना तेरा

अपनी आँखों में अभी कौंद गई बिजली- सी
हम न समझे के ये आना है या जाना तेरा

 

यूँ वो क्या आएगा फ़र्ते नज़ाकत से यहाँ
सख्त दुश्वार है धोके में भी आना तेरा

 

(फ़र्ते नज़ाकत – जरूरत से ज्यादा नज़ाकत )

 

दाग़ को यूँ वो मिटाते हैं, ये फ़रमाते हैं
तू बदल डाल, हुआ नाम पुराना तेरा

 

शायर : दाग देहलवी

आप का ऐतेबार कौन करे
रोज़ का इंतज़ार कौन करे

 

ज़िक्र-ए-मेहर-ओ-वफ़ा तो हम करते
पर तुम्हें शर्मसार कौन करे

 

(ज़िक्र-ए-मेहर-ओ-वफ़ा – प्यार और वफ़ा का ज़िक्र , शर्मसार – शर्मिंदा)

 

राहत इंदौरी शायरी

हो जो उस चश्म-ए-मस्त से बे-ख़ुद
फिर उसे होशियार कौन करे

 

(चश्म-ए-मस्त – नशीली आँखे)

 

तुम तो हो जान इक ज़माने की
जान तुम पर निसार कौन करे

 

(निसार – कुर्बान)

आफ़त-ए-रोज़गार जब तुम हो
शिकवा-ए-रोज़गार कौन करे

 

(आफ़त-ए-रोज़गार – जीवन की परेशानी, शिकवा-ए-रोज़गार – जीवन की शिकायत)

 

अपनी तस्बीह रहने दे ज़ाहिद
दाना दाना शुमार कौन करे

 

(तस्बीह – जपमाला , ज़ाहिद – फ़क़ीर, संत , शुमार – गिनती )

 

हिज्र में ज़हर खा के मर जाऊँ
मौत का इंतिज़ार कौन करे

 

(हिज्र – जुदाई )

 

आँख है, तर्क-ए-ज़ुल्फ़ है सय्याद
देखें दिल का शिकार कौन करे

 

(सय्याद – शिकारी)

 

वादा करते नहीं ये कहते हैं
तुझ को उम्मीद-वार कौन करे

 

‘दाग़’ की शक्ल देख कर बोले
ऐसी सूरत को प्यार कौन करे

 

शायर : दाग देहलवी

अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता
कभी जान सदक़े होती कभी दिल निसार होता

 

(विसाल-ए-यार – यार से मिलन, सदक़े – न्योछावर, निसार – कुर्बान)

 

कोई फ़ित्ना ता-क़यामत न फिर आश्कार होता
तेरे दिल पे काश ज़ालिम मुझे इख़्तियार होता

 

 

(फ़ित्ना – झगडा, बवाल, ता-क़यामत – कयामत तक , आश्कार – प्रकट, व्यक्त )

 

जो तुम्हारी तरह तुम से कोई झूटे वादे करता
तुम्हीं मुंसिफ़ी से कह दो तुम्हें ऐतबार होता

 

(मुंसिफ़ी – न्याय)

Heart Touching Ghazal in Hindi
Heart Touching Ghazal image

ग़म-ए-इश्क़ में मज़ा था जो उसे समझ के खाते
ये वो ज़हर है कि आख़िर मय-ए-ख़ुश-गवार होता

 

(मय-ए-ख़ुश-गवार – दिलकश शराब, बढ़िया शराब)

 

न मज़ा था दिल-लगी का कि बराबर आग लगती
न तुझे क़रार होता न मुझे क़रार होता

 

(क़रार – आराम)

 

ये मज़ा है दुश्मनी में न है लुत्फ़ दोस्ती में
कोई ग़ैर ग़ैर होता कोई यार यार होता

 

तेरे वादे पर सितमगर अभी और सब्र करते
अगर अपनी ज़िंदगी का हमें ऐतेबार होता

 

(सितमगर – अत्याचारी, दर्द देने वाला)

 

ये वो दर्द-ए-दिल नहीं है कि हो चारासाज़ कोई
अगर एक बार मिटता तो हज़ार बार होता

 

(चारासाज़ – हकीम)

 

गए होश तेरे ज़ाहिद जो वो चश्म-ए-मस्त देखी
मुझे क्या उलट न देते जो न बादा-ख़्वार होता

 

(ज़ाहिद – सन्यासी, त्यागी , चश्म-ए-मस्त – नशीली आँखें, बादा-ख़्वार – शराब पीने वाला )

 

मुझे मानते सब ऐसा कि अदू भी सज्दे करते
दर-ए-यार काबा बनता जो मेरा मज़ार होता

 

(अदू – दुश्मन , दर-ए-यार – महबूब का दरवाज़ा )

 

तुम्हें नाज़ हो न क्यूँकर कि लिया है ‘दाग़’ का दिल
ये रक़म न हाथ लगती न ये इफ़्तिख़ार होता

(इफ़्तिख़ार – मान सम्मान )

शायर : मिर्ज़ा ग़ालिब

 

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता

 

(विसाल-ए-यार – यार से मिलन)

 

Heart Touching Ghazal

तेरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता

 

तेरे नाज़ुकी से जाना कि बँधा था अहद बोदा
कभी तू न तोड़ सकता अगर उस्तुवार होता

 

(अहद – दुनिया , बोदा – कमज़ोर, उस्तुवार – ताक़तवर)

 

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीम-कश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता

 

(तीर-ए-नीम-कश – आधा धंसी तीर, ख़लिश – चुभन)

 

ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह
कोई चारासाज़ होता कोई ग़म-गुसार होता

 

(नासेह – समझाने वाले, नेक सलाह देने वाले , चारासाज़ – मर्ज़ दूर करने वाला , ग़म-गुसार – दर्द दूर करने वाला )

 

रग-ए-संग से टपकता वो लहू कि फिर न थमता
जिसे ग़म समझ रहे हो ये अगर शरार होता

 

(रग-ए-संग – पत्थर की नश , शरार – चिंगारी)

 

ग़म अगरचे जाँ-गुसिल है प कहाँ बचें कि दिल है
ग़म-ए-इश्क़ गर न होता ग़म-ए-रोज़गार होता

 

(अगरचे – हालाँकि , जाँ-गुसिल – दिल तोड़ने वाला , ग़म-ए-रोज़गार – जीवन का गम )

 

कहूँ किस से मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता

 

(शब-ए-ग़म – रात का दर्द)

 

हुए मर के हम जो रुस्वा हुए क्यूँ न ग़र्क़-ए-दरिया
न कभी जनाज़ा उठता न कहीं मज़ार होता

 

(रुस्वा – बदनाम, ग़र्क़-ए-दरिया

 

उसे कौन देख सकता कि यगाना है वो यकता
जो दुई की बू भी होती तो कहीं दो-चार होता

 

(यगाना – अनोखा , यकता – जिसका कोई सानी नहीं , अतुल्य , दुई – दो , दो-चार – मुलाकात)

 

ये मसाईल-ए-तसव्वुफ़ ये तेरा बयान ‘ग़ालिब’
तुझे हम वली समझते जो न बादा-ख़्वार होता

 

(मसाईल-ए-तसव्वुफ़ – रहस्यवाद का सवाल, अध्यात्म की बाते , वली – संत महात्मा , बादा-ख़्वार – दारू पीने वाला )

शायर : दाग देहलवी

 

दिल-ए-नाकाम के हैं काम ख़राब
कर लिया आशिक़ी में नाम ख़राब

 

इस ख़राबात का यही है मज़ा
कि रहे आदमी मुदाम ख़राब

 

(ख़राबात – दारु अड्डा, जुए का अड्डा , मुदाम – हमेशा )

 

देख कर जिंस-ए-दिल वो कहते हैं
क्यूँ करे कोई अपने दाम ख़राब

 

अब्र-ए-तर से सबा ही अच्छी थी
मेरी मिट्टी हुई तमाम ख़राब

 

(अब्र-ए-तर – बारिश, सबा – हवा का झोंका )

 

वो भी साक़ी मुझे नहीं देता
वो जो टूटा पड़ा है जाम ख़राब

 

क्या मिला हम को ज़िंदगी के सिवा
वो भी दुश्वार ना-तमाम ख़राब

 

(दुश्वार – मुश्किल , ना-तमाम – अधूरी )

 

वाह क्या मुँह से फूल झड़ते हैं
ख़ूब-रू हो के ये कलाम ख़राब

 

(ख़ूब-रू – सुन्दर लोग , कलाम – बातें)

 

चाल की रहनुमा-ए-इश्क़ ने भी
वो दिखाया जो था मक़ाम ख़राब

 

(चाल – शाजिश, रहनुमा-ए-इश्क़ – प्यार के गुरु, मक़ाम – मंजिल)

 

‘दाग़’ है बद-चलन तो होने दो
सौ में होता है इक ग़ुलाम ख़राब

 

शायर : दाग़ देहलवी

 

दिल गया तुम ने लिया हम क्या करें
जाने वाली चीज़ का ग़म क्या करें

 

हम ने मर कर हिज्र में पाई शिफ़ा
ऐसे अच्छों का वो मातम क्या करें

 

(हिज्र – जुदाई , शिफ़ा – इलाज़ )

 

अपने ही ग़म से नहीं मिलती निजात
इस बिना पर फ़िक्र-ए-आलम क्या करें

 

(फ़िक्र-ए-आलम – दुनिया की चिंता )

 

एक साग़र पर है अपनी ज़िंदगी
रफ़्ता रफ़्ता इस से भी कम क्या करें

 

(साग़र – शराब का प्याला)

 

कर चुके सब अपनी अपनी हिकमतें
दम निकलता हो तो हमदम क्या करें

 

(हिकमतें – समझदारी)

 

दिल ने सीखा शेवा-ए-बेगानगी
ऐसे ना-महरम को महरम क्या करें

 

(शेवा-ए-बेगानगी – अलगाव की आदत , ना-महरम – अशुद्द, बिगड़े हुए , महरम – अन्तरंग मित्र)

 

मारका है आज हुस्न ओ इश्क़ का
देखिए वो क्या करें हम क्या करें

 

(मारका – युद्द)

 

आईना है और वो हैं देखिए
फ़ैसला दोनों ये बाहम क्या करें

 

(बाहम – मिलकर)

 

आदमी होना बहुत दुश्वार है
फिर फ़रिश्ते हिर्स-ए-आदम क्या करें

 

(हिर्स-ए-आदम – आदम की लालच)

 

तुंद-ख़ू है कब सुने वो दिल की बात
और भी बरहम को बरहम क्या करें

 

(तुंद-ख़ू – तेज़ मिजाज़, जोशीला, बरहम – बिगड़े हुए )

 

हैदराबाद और लंगर याद है
अब के दिल्ली में मोहर्रम क्या करें

 

कहते हैं अहल-ए-सिफ़ारिश मुझ से ‘दाग़’
तेरी क़िस्मत है बुरी हम क्या करें

 

(अहल-ए-सिफ़ारिश – सिफारिश की ख्वाहिश)

शायर : इब्ने इंशा

 

कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा
कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा

 

हम भी वहीं मौजूद थे, हम से भी सब पूछा किए,
हम हँस दिए, हम चुप रहे, मंज़ूर था परदा तेरा ।

 

इस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटी महिफ़लें,
हर शख़्स तेरा नाम ले, हर शख़्स दीवाना तेरा ।

 

कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएँ मगर,
जंगल तेरे, पर्वत तेरे, बस्ती तेरी, सहरा तेरा ।

 

तू बेवफ़ा तू मेहरबाँ हम और तुझ से बद-गुमाँ,
हम ने तो पूछा था ज़रा ये वक्त क्यूँ ठहरा तेरा ।

 

हम पर ये सख़्ती की नज़र हम हैं फ़क़ीर-ए रहगुज़र,
रस्ता कभी रोका तेरा दामन कभी थामा तेरा ।

 

दो अश्क जाने किस लिए, पलकों पे आ कर टिक गए,
अल्ताफ़ की बारिश तेरी अक्राम का दरिया तेरा।

 

हाँ हाँ, तेरी सूरत हँसी, लेकिन तू ऐसा भी नहीं,
इस शख़्स के अशआर से, शोहरा हुआ क्या-क्या तेरा।

 

बेशक, उसी का दोष है, कहता नहीं ख़ामोश है,
तू आप कर ऐसी दवा बीमार हो अच्छा तेरा ।

 

बेदर्द, सुननी हो तो चल, कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल,
आशिक़ तेरा, रुसवा तेरा, शायर तेरा, ‘इन्शा’ तेरा

 

 

शायर : मीर तकी मीर

 

उलटी हो गई सब तदबीरें, कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया

 

अह्द-ए-जवानी रो-रो काटा, पीरी में लीं आँखें मूँद
यानि रात बहुत थे जागे सुबह हुई आराम किया

 

नाहक़ हम मजबूरों पर ये तोहमत है मुख़्तारी की
चाहते हैं सो आप करें हैं, हमको अबस बदनाम किया

 

सारे रिन्दो-बाश जहाँ के तुझसे सजुद में रहते हैं
बाँके टेढ़े तिरछे तीखे सब का तुझको अमान किया

 

सरज़द हम से बे-अदबी तो वहशत में भी कम ही हुई
कोसों उस की ओर गए पर सज्दा हर हर गाम किया

 

किसका क़िबला कैसा काबा कौन हरम है क्या अहराम
कूचे के उसके बाशिन्दों ने सबको यहीं से सलाम किया

 

ऐसे आहो-एहरम-ख़ुर्दा की वहशत खोनी मुश्किल थी
सिहर किया, ऐजाज़ किया, जिन लोगों ने तुझ को राम किया

 

याँ के सपेद-ओ-स्याह में हमको दख़ल जो है सो इतना है
रात को रो-रो सुबह किया, या दिन को ज्यों-त्यों शाम किया

 

सायदे-सीमीं दोनों उसके हाथ में लेकर छोड़ दिए
भूले उसके क़ौलो-क़सम पर हाय ख़याले-ख़ाम किया

 

ऐसे आहू-ए-रम ख़ुर्दा की वहशत खोनी मुश्किल है
सिह्र किया, ऐजाज़ किया, जिन लोगों ने तुझको राम किया

 

‘मीर’ के दीन-ओ-मज़हब का अब पूछते क्या हो उनने तो
क़श्क़ा खींचा दैर में बैठा, कबका तर्क इस्लाम किया

शायर : बहादुर शाह ज़फ़र

 

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-नापायेदार में

 

बुलबुल को बागबां से न सैय्याद से गिला
किस्मत में कैद थी लिखी फ़स्ले बहार में

 

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में

 

इक शाख़-ए-गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमां
कांटे बिछा दिए हैं दिल-ए-लालाज़ार में

 

उम्र-ए-दराज़ माँग कर लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गये दो इन्तज़ार में

 

दिन जिंदगी के ख़त्म हुए शाम हो गई
फैला के पाँव सोयेंगे कुंजे मज़ार में

 

कितना है बदनसीब ‘ज़फ़र’ दफ़्न के लिये
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में

शायर : अंदलिप सदानी

 

देर लगी आने में तुमको, शुकर है फिर भी आये तो
आस ने दिल का साथ ना छोड़ा , वैसे हम घबराये तो

 

सफ़क, धनक, महताब , घटाए, तारे , नगमे, बिजली फूल
इस दमन में क्या क्या कुछ है, दामन हाँथ में आये तो

 

चाहत के बदले मैं हम, बेच दें अपनी मर्ज़ी तक
कोई मिले तो दिल का गाहक, कोई हमे अपनाये तो

 

सुनी सुनाई बात नहीं ये, अपने ऊपर बीती है
फूल खिले हैं शोलो से , चाहत आग लगाये तो

 

झूठ है सब ! तारीख हमेशा अपने को दोहराती है
अच्छा मेरा कवाब-ए-जवानी थोडा सा दोहराए तो

 

नादानी और मजबूरी में यारों कुछ तो फर्क करो
इक बेबस इंसान करे क्या, टूट के दिल आ जाए तो

 

शायर : जिगर मुरादाबादी

 

हमको मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं
हमसे ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं

 

बेफ़ायदा अलम नहीं, बेकार ग़म नहीं
तौफ़ीक़ दे ख़ुदा तो ये ने’आमत भी कम नहीं

 

मेरी ज़ुबाँ पे शिकवा-ए-अह्ल-ए-सितम नहीं
मुझको जगा दिया यही एहसान कम नहीं

 

या रब! हुजूम-ए-दर्द को दे और वुस’अतें
दामन तो क्या अभी मेरी आँखें भी नम नहीं

 

ज़ाहिद कुछ और हो न हो मयख़ाने में मगर
क्या कम ये है कि शिकवा-ए-दैर-ओ-हरम नहीं

 

शिकवा तो एक छेड़ है लेकिन हक़ीक़तन
तेरा सितम भी तेरी इनायत से कम नहीं

 

मर्ग-ए-ज़िगर पे क्यों तेरी आँखें हैं अश्क-रेज़
इक सानिहा सही मगर इतनी अहम नहीं

 

 

शायर : मीर तकी मीर

 

फकीराना आये सदा कर चले
मियाँ खुश रहो हम दुआ कर चले

 

कोई नाउमीदाना करते नागाह
सो तुम हमसे मुंह भी छिपा कर चले

 

बहोत आरजू थी गली की तेरे
सो याँ से लहू में नहा कर चले

 

जो तुझ बिन ना जीने को कहते थे हम
सो इस अहद को अब वफ़ा कर चले

 

दिखाई दिए यूं के बेखुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले

 

जबीं सिज्दा करते ही करते गई
हके-बंदगी हम अदा कर चले

 

परस्तिश की यांतइं , के ऐ बुत तुझे
नज़र में सभों की खुदा कर चले

 

गयीं उम्र दर बंद-ए-फ़िक्र-ए-ग़ज़ल
सो इस फन को ऐसा बड़ा कर चले

 

 

कहें क्या जो पूछे कोई हमसे मीर
जहाँ में तुम आये थे क्या कर चले

 

शायर : हसरत मोहानी

 

तोड़ कर अहद-ए-क़रम न-आशना हो जाइए
बंदा परवर जाइए अच्छा ख़फा हो जाइए

 

राह में मिलिए कभी मुझ से तो अज़ारा-ए-सितम
होंठ अपने काट कर फ़ौरन जुदा हो जाइए

 

जी में आता है के उस शोख़-ए-तघाफुल केश से
अब न मिलिए फिर कभी और बेवफा हो जाइए

 

 

हाए रे बे-इख्तियारी ये तो सब कुछ हो मगर
उस सरापा नाज़ से क्यूँ कर ख़फा हो जाइए

 

शायर : मिर्ज़ा ग़ालिब

 

फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया
दिल जिगर तश्ना-ए-फ़रियाद आया

 

दम लिया था न क़यामत ने हनोज़
फिर तेरा वक़्त-ए-सफ़र याद आया

 

सादगी हाये तमन्ना यानी
फिर वो नैइरंग-ए-नज़र याद आया

 

उज़्र-ए-वामाँदगी अए हस्रत-ए-दिल
नाला करता था जिगर याद आया

 

ज़िन्दगी यूँ भी गुज़र ही जाती
क्यों तेरा राहगुज़र याद आया

 

क्या ही रिज़वान से लड़ाई होगी
घर तेरा ख़ुल्‌द में गर याद आया

 

Shubh Prabhat Hindi

आह वो जुर्रत-ए-फ़रियाद कहाँ
दिल से तंग आके जिगर याद आया

 

फिर तेरे कूचे को जाता है ख़्याल
दिल-ए-ग़ुमगश्ता मगर याद आया

 

कोई वीरानी-सी-वीरानी है
दश्त को देख के घर याद आया

 

मैंने मजनूँ पे लड़कपन में ‘असद’
संग उठाया था के सर याद आया

 

शायर : मिर्ज़ा ग़ालिब

 

लाज़िम था कि देखो मेरा रस्ता कोई दिन और
तन्हा गये क्यों? अब रहो तन्हा कोई दिन और

 

मिट जायेगा सर, गर तेरा पत्थर न घिसेगा
हूँ दर पे तेरे नासिया-फ़र्सा कोई दिन और

 

आये हो कल और आज ही कहते हो कि जाऊँ
माना कि हमेशा नहीं, अच्छा, कोई दिन और

 

जाते हुए कहते हो, क़यामत को मिलेंगे
क्या ख़ूब! क़यामत का है गोया कोई दिन और

 

हाँ ऐ फ़लक-ए-पीर, जवां था अभी आ़रिफ़
क्या तेरा बिगड़ता जो न मरता कोई दिन और

 

तुम माह-ए-शब-ए-चार-दहुम थे मेरे घर के
फिर क्यों न रहा घर का वो नक़्शा कोई दिन और

 

तुम कौन से ऐसे थे खरे दाद-ओ-सितद के
करता मलक-उल-मौत तक़ाज़ा कोई दिन और

 

मुझसे तुम्हें नफ़रत सही, नय्यर से लड़ाई
बच्चों का भी देखा न तमाशा कोई दिन और

 

 

ग़ुज़री न बहरहाल या मुद्दत ख़ुशी-नाख़ुश
करना था, जवां-मर्ग! गुज़ारा कोई दिन और

 

नादां हो जो कहते हो कि क्यों जीते हो ‘ग़ालिब’
क़िस्मत में है मरने की तमन्ना कोई दिन और

 

“shubh prabhat shayari”

निष्कर्ष

दोस्तों इस पोस्ट  को पड़ने के लिए धन्यवाद इय होप ये पोस्ट Heart Touching Ghazal in Hindi | रोमांटिक लव ग़ज़ल हिंदी आपको अच्छी लगी हो तो इसको अपने दोस्तों या  फॅमिली में शेयर करे  दोस्तों इस Vipchilli वेबसाइट पर कोट्स शायरी मिलते हैं उम्मीद हैं आप अपने दोस्तों को या पोस्ट शेयर करंगे दोस्तों इस पोस्ट में कुछ भी मिस्टेक हो तो कमेंट करके बताये  आप आज का दिन अच्छा जाये  फिर मिलते हैं अगली पोस्ट …

Sharing :

Aziz is a Website designer of this website ( vipchilli.com ) it is a Profession Generate mock test quiz question . He is quotes Shayari social Worker .

Leave a Comment